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23 May, 2014

"कठिन बुढ़ापा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
 
एक कविता
"कठिन बुढ़ापा"
बचपन बीता गयी जवानी, कठिन बुढ़ापा आया।
कितना है नादान मनुज, यह चक्र समझ नही पाया।

अंग शिथिल हैं, दुर्बल तन है, रसना बनी सबल है।
आशाएँ और अभिलाषाएँ, बढ़ती जाती प्रति-पल हैं।।

धीरज और विश्वास संजो कर, रखना अपने मन में।
रंग-बिरंगे सुमन खिलेंगे, घर, आंगन, उपवन में।।

यही बुढ़ापा अनुभव के, मोती लेकर आया है।
नाती-पोतों की किलकारी, जीवन में लाया है।।

मतलब की दुनिया मे, अपने कदम संभल कर धरना।
वाणी पर अंकुश रखना, टोका-टाकी मत करना।।

देख-भालकर, सोच-समझकर, ही सारे निर्णय लेना।
भावी पीढ़ी को उनका, सुखमय जीवन जीने देना।।

19 May, 2014

"फिर से आया मेरा बचपन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
एक गीत
"फिर से आया मेरा बचपन"
जब से उम्र हुई है पचपन। 
फिर से आया मेरा बचपन।। 

पोती-पोतों की फुलवारी, 

महक रही है क्यारी-क्यारी, 
भरा हुआ कितना अपनापन। 
फिर से आया मेरा बचपन।। 
इन्हें मनाना अच्छा लगता, 
कथा सुनाना अच्छा लगता, 
भोला-भाला है इनका मन। 
फिर से आया मेरा बचपन।।  

मुन्नी तुतले बोल सुनाती, 

मिश्री कानों में घुल जाती, 
चहक रहा जीवन का उपवन। 
फिर से आया मेरा बचपन।। 
बादल जब जल को बरसाता,
गलियों में पानी भर जाता, 
गीला सा हो जाता आँगन। 
फिर से आया मेरा बचपन।। 
कागज की नौका बन जाती,
कभी डूबती और उतराती, 
ढलता जाता यों ही जीवन। 
फिर से आया मेरा बचपन।।

15 May, 2014

"शान्ति का कपोत बाज का शिकार हो गया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मखमली लिबास आज तार-तार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  

सभ्यताएँ मर गईं हैं, आदमी के देश में, 
क्रूरताएँ बढ़ गईं हैं, आदमी के वेश में, 
मौत की फसल उगी हैं, जीना भार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  

भोले पंछियों के पंख, नोच रहा बाज है, 
गुम हुए अतीत को ही, खोज रहा आज है,  
शान्ति का कपोत बाज का शिकार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  

पर्वतों से बहने वाली धार, मैली हो गईं, 
महक देने वाली गन्ध भी, विषैली हो गई, 
जिस सुमन पे आस टिकी, वो ही खार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!

11 May, 2014

"ग़ज़ल-लगे खाने-कमाने में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

छलक जाते हैं अब आँसूग़ज़ल को गुनगुनाने में।
नही है चैन और आरामइस जालिम जमाने में।।

नदी-तालाब खुद प्यासेचमन में घुट रही साँसें,
प्रभू के नाम पर योगीलगे खाने-कमाने में।

हुए बेडौल तनचादर सिमट कर हो गई छोटी,
शजर मशगूल हैं अपने फलों को आज खाने में।

दरकते जा रहे अब तोहमारी नींव के पत्थर,
चिरागों ने लगाई आगखुद ही आशियाने में।

लगे हैं पुण्य पर पहरेदया के बन्द दरवाजे,
दुआएँ कैद हैं अब तोगुनाहों की दुकानों में।

जिधर देखो उधर ही “रूप” का, सामान बिकता है,
रईसों के यहाँ अब, इल्म रहता पायदानों में।

07 May, 2014

"गीत-क्या हो गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज मेरे देश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??
पुष्प-कलिकाओं पे भँवरे, रात-दिन मँडरा रहे,
बागवाँ बनकर लुटेरे, वाटिका को खा रहे,
सत्य के उपदेश को क्या हो गया है?

मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??
धर्म-मज़हब का हमारे देश में सम्मान है,
जियो-जीने दो, यही तो कुदरती फरमान है,
आज इस आदेश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??

खोजते दैर-ओ-हरम में राम और रहमान को,
एकदेशी समझते हैं, लोग अब भगवान को,
धार्मिक सन्देश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??

03 May, 2014

"गीत गाना जानते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत
"गीत गाना जानते हैं" 
वेदना की मेढ़ को पहचानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

भावनाओं पर कड़ा पहरा रहा,
दुःख से नाता बहुत गहरा रहा,,
मीत इनको हम स्वयं का मानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

रात-दिन चक्र चलता जा रहा 
वक्त ऐसे ही निकलता जा रहा
खाक दर-दर की नहीं हम छानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

शूल के ही साथ रहते फूल हैं,
एक दूजे के लिए अनुकूल हैं,
बैर काँटों से नहीं हम ठानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

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